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यूक्रेन के छोटे और कम लागत के ड्रोनों ने रुस में मचाई तबाही

क्या अब एफ-35 जैसे फाइटर जेट बन जाएंगे इतिहास
कीव। यूक्रेन ने रूस पर ड्रोन से जो सबसे बड़ा हमला किया था, उसे दुनिया की ‘सबसे साहसी’ ड्रोन स्ट्राइक में गिना जा रहा है। इस ऑपरेशन का नाम था ऑपरेशन स्पाइडरवेब और इसमें 100 से ज्यादा सस्ते, लेकिन बेहद स्मार्ट ड्रोन यूज़ किए गए थे। नतीजा ये हुआ कि रूस के मिलिट्री एयरबेस पर खड़े करीब 40 लॉन्ग-रेंज बमवर्षक और कई फाइटर प्लेन तबाह हो गए। रुस को तकरीबन 7 बिलियन डॉलर का नुकसान हुआ है। अब सवाल ये उठ रहा है कि क्या एक लाख के ड्रोन अब 800 करोड़ के जेट को हरा सकते हैं?
यूक्रेन का ये हमला रूस के पांच अलग-अलग क्षेत्रों में एक साथ किया गया। रूस के डिफेंस मिनिस्ट्री के मुताबिक ये ड्रोन रूस के कई टाइम जोन में फैले एयरफील्ड्स तक पहुंचे और वहां मौजूद अत्याधुनिक बमवर्षकों को खाक कर दिया। टीयू-95 और टीयू-22एम जैसे जेट जो यूक्रेन पर मिसाइल्स दागने के लिए जाने जाते थे, अब कबाड़ बन गए हैं। ए-50 जैसे एयरक्राफ्ट जो हवा में दुश्मन का पता लगाते थे, अब खुद शिकार हो गए।
यूक्रेनी राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की ने इस ऑपरेशन को ‘ब्रिलियंट’ कहा और दावा किया कि इसे तैयार करने में 1 साल, 6 महीने और 9 दिन लगे थे। यही नहीं, ऑपरेशन की प्लानिंग उस बिल्डिंग से की गई जो रूस की एफएसबी के हेडक्वार्टर के पास थी। इसका मतलब ये हमला सिर्फ टेक्नोलॉजी का नहीं, हिम्मत और साइकोलॉजिकल वॉरफेयर का भी था। ये बात अब सामने आ चुकी है कि ये हमले पहले से रूस के अंदर स्मगल किए गए एफपीवी ड्रोन से किए गए। इन ड्रोन को छोटे मोबाइल वुडन हाउस में छिपाकर रखा गया था। जब सही वक्त आया, तब उन घरों की छतें रिमोट से खुलीं और ड्रोन उड़ते हुए आसमान में निकल गए।
कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक ये हाउस ट्रकों पर लोड थे और चलते-फिरते ‘ड्रोन बेस’ बन चुके थे। रूसी मीडिया में वायरल वीडियो में ड्रोन कंटेनर से उड़ते नजर आए, कुछ लोग उन्हें रोकने की नाकाम कोशिश करते भी दिखे। ड्रोन कोई नई चीज नहीं है। वर्ल्ड वॉर में भी रेडियो से कंट्रोल होने वाले पायलटलेस एयरक्राफ्ट्स टेस्ट किए गए थे, लेकिन जो यूज़ यूक्रेन कर रहा है, वो वाकई गेम-चेंजिंग है। अब हर यूक्रेनी ब्रिगेड में एक ‘ड्रोन यूनिट’ है। 2024 की शुरुआत में यूक्रेन ने 10 लाख एफपीवी ड्रोन बनाने का टारगेट रखा था और अक्टूबर तक उनकी मैन्युफैक्चरिंग कैपेसिटी 4 मिलियन सालाना तक पहुंच चुकी है। ये टारगेट को सीधे भेद सकते हैं, मिस की संभावना कम होती है। चलते ट्रकों, बंकरों और एयरक्राफ्ट को भी ट्रैक कर सकते हैं। इनका विस्फोटक भार कम होता है, लेकिन प्रिसिजन स्ट्राइक की क्षमता इन्हें घातक बनाती है।
एलन मस्क ने पिछले साल कहा था कि एफ-35 जैसे महंगे फाइटर जेट्स का जमाना अब खत्म हो गया है। उनका तर्क था कि ‘इन जेट्स में पायलट की जान को खतरा है, जबकि ड्रोन बिना जान गंवाए दुश्मन को तबाह कर सकते हैं। एफ-35, जिसे लॉकहीड मॉर्टिन बनाता है उसकी कीमत 80 से 100 मिलियन डॉलर है। इसमें स्टील्थ, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर, इंटेलिजेंस और सर्विलांस की खूबियां हैं, लेकिन इसके सॉफ्टवेयर में बार-बार टेक्निकल प्रॉब्लम आती है। इसकी मेंटेनेंस महंगी है और अब जब 500 डॉलर का ड्रोन 100एमएन के जेट को गिरा सकता है, तो इसकी वैल्यू वाकई में सवालों के घेरे में है।
जब ट्रंप प्रशासन ने भारत को एफ-35 बेचने का प्रस्ताव दिया, तो भारत ने कोई कमिटमेंट नहीं किया। इसके बजाय मोदी सरकार ने स्वदेशी स्टील्थ फाइटर प्रोजेक्ट को फास्ट-ट्रैक करने का फैसला लिया। इसके अलावा, ऑपरेशन सिंदूर में भारत ने भी ड्रोन का जबरदस्त इस्तेमाल किया था। भारत साफ कर चुका है कि वह भविष्य की जंग में ड्रोन टेक्नोलॉजी को ही आगे रखेगा। अब जंग जीतने के लिए अरबों डॉलर की जरूरत नहीं है, इनोवेशन और इंटेलिजेंस काफी है।

Deepu Choubey

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