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प्राकृतिक वातावरण में सहज केन्द्रित हो जाता है ध्यान

आचार्यश्री समयसागर महाराज के प्रवचन
जबलपुर। आचार्यश्री विद्यासागर सभा भवन में आयोजित धर्मसभा में आचार्यश्री समयसागर महाराज ने अपने प्रवचन में कहा कि जब तीर्थंकर भगवान दीक्षा लेते हैं, तो वे राजसी वैभव और महलों को छोड़कर वन चले जाते है। वे भीड़ से दूर रहकर प्रकृति के सान्निध्य में ध्यान लगाते हैं। प्राकृतिक वातावरण में ध्यान के लिए किसी विशेष ध्यान केंद्र की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि ध्यान सहज रूप से स्थिर हो जाता है।
आचार्यश्री ने कहा कि आज विश्व पर्यावरण दिवस है, और इस अवसर पर हमें यह स्मरण करना चाहिए कि पर्यावरण की रक्षा और उसका संवर्धन हम सभी का धर्म और कर्तव्य है। तीर्थंकर मुनिराज जंगलों की शांति में, भौतिकता से दूर रहकर तपस्या करते हैं। बाहरी वातावरण उनके ध्यान में विघ्न नहीं डालता, क्योंकि वे स्वयं को प्रकृति के साथ एकात्म कर लेते हैं।
उन्होंने कहा कि संस्कृति, विकृति और प्रकृति—ये तीनों शब्द गहराई से जुड़े हैं। आज पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव से समाज में विकृति बढ़ रही है। इससे बचाव के लिए हमें पुनः प्रकृति की ओर लौटना होगा। आज के समय में प्राकृतिक और धार्मिक वातावरण की सबसे अधिक आवश्यकता है।
धर्मसभा का शुभारंभ मंगलाचरण पाठ से हुआ, जिसे सुनीता घीया ने प्रस्तुत किया। आचार्यश्री विद्यासागर महाराज के तैलचित्र के समक्ष कैलाशचंद जैन, सत्येन्द्र जैन ‘जुग्गु’ तथा दिगंबर जैन सोशल ग्रुप फेडरेशन के पदाधिकारियों ने दीप प्रज्वलित किया। शास्त्र भेंट और पाद प्रक्षालन का सौभाग्य क्षुल्लक सुधर्मसागर महाराज के गृहस्थ परिजनों को प्राप्त हुआ।
इस अवसर पर गाडरवारा एवं सागर की जैन समाज ने आचार्यश्री से चातुर्मास हेतु निवेदन किया। वहीं दिगंबर जैन सोशल ग्रुप जबलपुर नगर के पदाधिकारियों और सदस्यों ने आचार्यश्री को श्रीफल भेंट कर आशीर्वाद प्राप्त किया।

Deepu Choubey

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