तिब्बती धर्मगुरु के उत्तराधिकारी को लेकर दलाई लामा और चीन हुए आमने-सामने
नई दिल्ली।भारत के हिमाचल-प्रदेश से दशकों से निर्वासन में अपनी सरकार चलाने वाले सर्वोच्च तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा और चीन के बीच तकरार तो जगजाहिर है। लेकिन अब दोनों के बीच जिस मामले को लेकर वाद-विवाद उठ खड़ा हुआ है। उसका संबंध दलाई लामा की बढ़ती उम्र के चलते तिब्बती धर्मगुरु के उत्तराधिकारी के चयन को लेकर है। दलाई लामा का कहना है कि उत्तराधिकारी के चयन में तिब्बती बौद्ध परंपराओं की प्रधानता रहेगी। चीन की इसमें किसी तरह की कोई भूमिका नहीं होगी। जबकि चीन ने इस पर अपनी आंखे तरेरते हुए चयन के लिए न केवल सदियों पुरानी अपनी स्वर्ण कलश से पर्ची निकालने की शर्त रख दी है। बल्कि ये भी कहा है कि चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार से पर्ची में निकलने वाले नाम की मंजूरी मिले बिना तिब्बती धर्मगुरु के उत्तराधिकारी का चयन नहीं होगा। यहां बता दें कि 6 जुलाई को दलाई लामा का 90वां जन्मदिन है। उससे ठीक पहले उन्होंने अपने उत्तराधिकारी के चयन को लेकर यह महत्वपूर्ण बयान दिया है। जिसके जवाब में चीन की यह बेहद तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है। अपने बयान में दलाई लामा ने उत्तराधिकारी के चयन की जिम्मेदारी गादेन फोडरंग ट्रस्ट को सौंपी है। जिसकी स्थापना उनके कार्यालय द्वारा वर्ष 2015 में की गई थी। साथ ही ये भी साफ कर दिया है कि वह ट्रस्ट ही होगा जो कि उनके पुनर्जन्म की खोज (उत्तराधिकारी) की पहचान करने और उसकी मान्यता संबंधी तमाम जरूरी प्रक्रिया को पूरा करेगा। उनके मुताबिक, 15वें दलाई लामा का चयन तिब्बती बौद्ध धर्म से जुड़े समय-सम्मानित रीति-रिवाजों के तहत निदेर्शित होना चाहिए। वहीं, इन सबके बीच ट्रस्ट के अधिकारियों का कहना है कि अगला दलाई लामा किसी भी लिंग का हो सकता है। गौरतलब है कि तिब्बती बौद्ध मानते हैं कि स्वयं दलाई लामा के पास यह अधिकार है कि वो किस शरीर में पुनर्जन्म लेंगे। यह एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसका संस्था ने कुल 14 बार पालन किया है। यहां पर तेनजिन ग्यात्सो का जिक्र करना बेहद जरूरी है। जो कि वर्तमान दलाई लामा का वास्तविक नाम है और जिन्हें 14वें दलाई लामा के रूप में वर्ष 1940 में मान्यता प्रदान की गई थी। उस वक्त उन्हें महज चार वर्ष की उम्र में 13वें दलाई लामा थुबतेन ग्यात्सो के अवतार के रूप में चुन लिया गया था। चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता माओ निंग ने बुधवार को कहा कि उत्तराधिकारी को चुनने के लिए स्वर्ण कलश पर्ची की प्रक्रिया को अपनाने के साथ ही संबंधित नाम को चीन की सरकार की स्वीकृति भी लेनी पड़ेगी। इसमें चीन की प्राचीन परंपराओं और रीति-रिवाजों का पालन करना पड़ेगा। स्वर्ण कलश पर्ची प्रक्रिया की शुरुआत 18वीं शताब्दी में हुई थी। जिस लिहाज से यह प्रक्रिया करीब 200 से अधिक वर्षों से चली आ रही है। जो दलाई लामा के चयन का एक वैध तरीका है। इतिहास में देखें तो 1792 में किंग राजवंश के सम्राट कियानलांग ने तिब्बत में राजनीतिक नियंत्रण स्थापित करने के लिए इस प्रक्रिया का आगाज किया था। यह कलश तिब्बती अनुष्ठान बर्तन की नकल करके तैयार किया गया था। जिसका उद्देश्य तिब्बत में चीन के प्रभाव में बढ़ोतरी करना था। चयन प्रक्रिया के दौरान कलश से एक पर्ची निकालकर दलाई लामा के नाम की घोषणा की जाती है।