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गलगला से प्रारंभ हुआ था शहर का बंगाली दशहरा

दुर्गा पूजा का सैकड़ो साल पुराना इतिहास 

जबलपुर। शहर का दुर्गा उत्सव अपनी भव्यता और यहां के लोगों की आस्था के चलते पूरे देश में मशहूर है। वैसे तो संस्कारधानी में सभी धर्म के त्यौहार उत्सव और उमंग के साथ मनाए जाते हैं लेकिन यहां का दशहरा कुछ खास है जिस तरह यहां का दशहरा भव्य है उतना ही रोचक इसका इतिहास भी है। बहुत ही कम लोगों को यह जानकारी है की मां दुर्गा की पूजा प्रथम बार वीरांगना रानी दुर्गावती के पवित्र नर्मदा तट पर बसी नगरी में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के 5 वर्ष पूर्व 1852 में गलगला क्षेत्र में हुई थी इसका आयोजन करने का श्रेय उसे समय के जबलपुर म्युनिसिपल कॉरपोरेशन के प्रथम भारतीय प्रेसिडेंट तथा प्रथम भारतीय अध्यक्ष जिला एवं प्रांत की प्रथम भारतीय सिविल जज राय बहादुर वीरेश्वर दत्त को जाता है। दुर्गा उत्सव के दौरान शहर में जगह-जगह दुर्गा प्रतिमाओं की स्थापना उनका भक्ति मानस पूजन अर्चन सांस्कृतिक कार्यक्रम एवं विसर्जन जुलूस जो आज हम सब देखते हैं यह सभी उसे दौर में प्रारंभ हुए थे इसके बारे में बताते हुए राय साहब के वंशज कहते हैं उन दिनों गलगला ही बंगाली टोला के नाम से जाना जाता था गलगला ताल एक बड़ा तालाब था। जिसमें मछलियां बहुतायत उपलब्ध रहती थी। उसे समय मोहन चंद्र चटर्जी राय बहादुर प्रभात चंद्र बोस के पिता बाबू प्रसन्न चंद्र बोस एसपी मुखर्जी के पिता माधव बाबू जज योगेश्वर चंद्र चटर्जी सब पोस्टमास्टर चंद्र बनर्जी आदि इसी जगह रहते थे।

समय उपरांत वर्ष के बाद कई लोगों के जिम्मे दुर्गा पूजन आयोजन की इस कड़ी में चीफ जस्टिस तरुण घोष ने 1929 चरण बैनर्जी के यहां से बंगाली क्लब में दुर्गा पूजा की जहां यह अब तक मनाई जा रही है।

 

    मुझे इस बात का गर्व और खुशी है कि आज जिस स्वरूप में विजयदशमी मनाई जाती है इसकी शुरुआत हमारे पर दादा राय बहादुर वीरेश्वर दत्त द्वारा इसी घर से की गई थी। – रविन्द्र दत्त, एडवोकेट

 

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