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नक्सल मुक्त अभियान सफल हो रहा है, पर पीड़ितों की समस्याओं का समाधान कब होगा

कांकेर। जिले के अति संवेदनशील नक्सल प्रभावित इलाकों से दिल को झकझोर देने वाली सच्चाई सामने आई है। यहां के कई ग्रामीण वर्षों से नक्सलियों के भय और उत्पीड़न का दंश झेलते आ रहे हैं। किसी ने अपने बेटे को खोया, किसी ने पति को, तो किसी ने अपनी बहन को नक्सल हिंसा में गंवा दिया। मजबूरीवश इन्हें अपना पुश्तैनी घर, खेत-खलिहान और पहचान छोड़कर दूसरे गांवों में शरण लेनी पड़ी। पीडित परिवारों का कहना है, “हम थक चुके हैं, लेकिन जब तक हमें पुनर्वास नीति के तहत नौकरी, मकान और बच्चों की शिक्षा नहीं मिलेगी, हम चुप नहीं बैठेंगे। हमने अपने जीवन के कीमती साल खो दिए, अब हमारी पीड़ा को समझिए।”यह सिर्फ एक सरकारी योजना का सवाल नहीं है, यह इंसानियत, अधिकार और सम्मान की पुकार है।
सबसे बड़ा दर्द यह है कि जो लोग हाल ही में नक्सल हिंसा से पीड़ित हुए हैं, उन्हें तो सरकार की पुनर्वास नीति का लाभ तुरंत मिल रहा है, लेकिन जिन्होंने दशकों पहले सब कुछ खोया, वे आज भी दर-दर भटक रहे हैं। आज ये पीड़ित परिवार कांकेर एसपी कार्यालय पहुंचे और पुनः आवेदन दिया बस एक ही मांग के साथ कि हमें न्याय चाहिए, हमें सम्मान के साथ जीने का हक चाहिए। इन पीड़ित परिवारों को गांव छोड़े अब 20 साल से ज्यादा हो चुके हैं। वे आज भी अस्थाई झोपड़ियों में रह रहे हैं, बिना किसी स्थायी घर, रोजगार या बच्चों की शिक्षा की व्यवस्था के। हालांकि शासन ने इन्हें नक्सल पीड़ित होने का प्रमाण पत्र दे दिया है, लेकिन इसका ठोस लाभ आज तक नहीं मिला।
Deepu Choubey

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