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मोरारी बापू से मिले बाबा रामदेव और बोले- बापू महापुरुष, उनकी आलोचना उचित नहीं

रामकथा के अंतिम दिन भी बापू ने मांगी क्षमा 

वाराणसी। प्रसिद्ध कथा वाचक मोरारी बापू की नौ दिवसीय रामकथा का रविवार को काशी में समापन हो गया। कथा के अंतिम दिन बापू ने यह कहते हुए एक बार फिर सभी महापुरुषों से क्षमा मांगी कि उन्हें लग रहा है मानो कथा अभी अधूरी है। बापू इसी के साथ वचन दिया कि अगली बार वे काशी कबीर मानस लेकर आएंगे। इस अवसर पर योगगुरु बाबा रामदेव विशेष रूप से बापू से मिलने पहुंचे थे। बाबा रामदेव ने यहां कहा कि बापू की आलोचना न तो उचित है और न ही आवश्यक। बापू तो राष्ट्र और संस्कृति की धरोहर हैं। वे बचपन से रामकथा कहते आ रहे हैं। उनके जीवन का उद्देश्य केवल राम की महिमा का गुणगान है। इसी के साथ रामदेव ने बापू को महापुरुष की संज्ञा भी दी।

इस अवसर पर मोरारी बापू ने कहा, योग जरूरी है, लेकिन परमात्मा और परस्पर प्रेम उससे भी अधिक जरूरी है। अगर प्रेम नहीं है, तो योग, ज्ञान, कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं रह जाता। उन्होंने सिंदूर की आध्यात्मिक व्याख्या करते हुए कहा, शिव-पार्वती का सिंदूरदान आधि-दैविक है, जबकि राम द्वारा जानकी की मांग भरना आध्यात्मिक है। अगर कोई बुद्ध पुरुष हमें अपनाता है, तो वही हमारे जीवन का सिंदूर है। बापू ने इस बात पर भी बल दिया कि हिंदू सनातन धर्म सर्वश्रेष्ठ है, क्योंकि यह सभी को स्वीकार करता है, सभी का सम्मान करता है।

बापू के आगे बेटा क्या बोलेगा : रामदेव 

बाबा रामदेव इस अवसर पर भावुक हो गए और कहा, कि हमें नहीं पता था कि काशी आना है, लेकिन बापू और शिव की कृपा से आ गए। हम सोच रहे थे कि क्या कहें? पर बाप के सामने बेटा क्या बोलेगा। उन्होंने मंच से कहा कि बापू के दो पुत्र हैं – एक पार्थिक और दूसरा पारमार्थिक, और हम सभी उनकी आत्मिक संतान हैं। बाबा रामदेव ने आगे कहा कि बापू की आलोचना अगर विधर्मी करते तो समझ आता, लेकिन सनातनी खुद क्यों तनातनी में लगे हैं? यह सनातन धर्म की संस्कृति नहीं है। बाबा रामदेव ने मंच से स्पष्ट किया कि बापू और मैं किसी भी राजनीति से नहीं जुड़े हैं। न हमें किसी नेता ने बुलाया है, न हम किसी राजनीतिक उद्देश्य से यहां हैं। उन्होंने कहा कि बापू के पास इतनी शक्ति है कि वह राजनेता बना सकते हैं, लेकिन कोई राजनेता उन्हें नहीं बना सकता।

पहले कुछ ही मुसलमान आते थे अब संख्या बढ़ गई 

बाबा रामदेव ने कहा कि कथा स्थल पर पहले कुछ ही मुसलमान आते थे, लेकिन अब उनकी संख्या बढ़ गई है, जो सनातन धर्म की व्यापकता और समावेशी स्वरूप को दर्शाता है। काशी की यह कथा केवल राम की महिमा तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह प्रेम, स्वीकार्यता और सनातन संस्कृति का ऐसा मंच बन गई, जहां से बापू और बाबा रामदेव ने समाज को विचार और आत्मचिंतन का संदेश दिया। मोरारी बापू का यह कथन कि मैं नित्य प्रसन्न हूं, क्योंकि मेरे बुद्ध पुरुष ने मेरी मांग भरी है, आध्यात्मिक प्रेम की गहराई को दर्शाता है, जो सनातन संस्कृति का मूल है।

 

Deepu Choubey

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